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वास्तु के अनुसार भवन या गृह निर्माण करते समय इन बातों का ध्यान रखें

भवन या मकान प्रत्येक व्यक्ति की मुलभुत आवश्यकताओं में से एक है। हर व्यक्ति का सपना होता है के उसका खुद का घर हो। हर इंसान चाहता है के उसका घर सबसे श्रेष्ठ बनें।

घर बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहले भवन का नक्शा तैयार किया जाता है, यानी भवन की रूप रेखा तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया में ध्यान रखना आवश्यक है के कौनसा कमरा किस दिशा में हो, मुख्यद्वार किस दिशा में हों, रसोईघर कहा बनाया जाए।

भवन निर्माण करते समय दिशाओं का ध्यान रखना बहुत आवश्यक होता है क्योंकि सहीं दिशा हमारे घर की सुख-समृद्धि को बढ़ाता है वहीँ इसके विपरीत गलत दिशा में बना हुआ भवन घर में शोक, रोग, कलह आदि लेकर आता है।

भवन या गृह निर्माण करते समय ध्यान देने योग्य बातें 

घर बनाने में हर कक्ष का, हर द्वार का अलग महत्व होता है। वास्तु के अनुसार हर दिशा और कोण को ध्यान रखना चाहिए।

यहाँ हम आपको भवन के हर कक्ष और द्वार की दिशाओं और कोण के बारे में बताएंगे।

मुख्यद्वार :

  • किसी भी भवन का का नक्शा बनाते समय सबसे पहले भवन के मुख्य द्वार निश्चित किया जाता है।
  • भूखण्ड के उत्तरी ईशान कोण (पूर्व दिशा और उत्तर दिशा) में मुख्यद्वार बहुत उत्तम माना जाता है।
  • उत्तरी ईशान कोण में द्वार बनाने से गृह स्वामी को बहुत लाभ मिलता है।
  • भूमि के पूर्वी ईशान कोण पर बनाया गया मुख्य द्वार पुरे परिवार के लिए लाभदायक होता है।
  • भवन के दक्षिणी आग्नेय कोण में बनाया गया द्वार भी लाभप्रद होता है।
  • भूखण्ड के पश्चिमी वायव्य कोण पर बनाया गया मुख्यद्वार भी उच्चकोटि का होता है।
  • भूमि के पूर्वी आग्नेय कोण में बनाया गया मुख्यद्वार सही नहीं होता।
  • पूर्वी आग्नेय कोण में बनाये गए मुख्यद्वार के परिणाम अच्छे नहीं होते।
  • दक्षिणी नैऋत्य कोण में भी मुख्यद्वार बनाना हानिकारक और घर के लोगो के लिए अस्वस्थकारी होता है।
  • पश्चिमी नैऋत्य कोण में बनाया गया मुख्यद्वार भी परिवार के मुखिया के लिए हानिकारक होता है।
  • भूमि के उत्तरी वायव्य कोण में बनाया गया मुख्यद्वार, घर में रहने वाले लोगो के मन को हमेशा विचलित रखता है।
  • मुख्यद्वार का आकर भवन के अन्य द्वारों की अपेक्षा बड़ा होना चाहिए।
  • दरवाजों को खोलते समय कोई भी आवाज नहीं होनी चाहिए।
  • किवाड़ अपने आप खुले या बंद हो तो यह भयदायक होता है।

भवन में दरवाजों की संख्या :

  • अगर मकान पूर्ण वास्तु के अनुसार बनाया जा रहा है, तो दरवाजों की संख्या सम हो विषम कोई फर्क नहीं पड़ता।
  • यदि भवन में चारों दिशाओं में द्वार बनवाने है तो उच्चकोटि के स्थान पर ही प्रवेश द्वार बनवाये।
  • भवन की तीनों दिशाओं में द्वार बनाना हो तो उत्तर दिशा और पूर्व दिशा में द्वार बनाना जरुरी है।
  • भवन में दो प्रवेशद्वार बनाना हों, तो शुभफल प्राप्त करने के लिए पूर्व और दक्षिण दिशा में बनवाना चाहिए।
  • पूर्व और पश्चिम दिशा में ही दो दरवाजें लगवाना शुभ नहीं होता।

द्वारवेध :

  • मुख्यद्वार के सामने कोई भी विघ्न आता है जैसे की द्वार के सामने खम्भा, सीढ़ी, बड़ा पेड़, मशीन या कोल्हू द्वारवेध माना जाता है।
  • भवन के मुख्यद्वार के समक्ष बड़े पेड़ का होना बच्चों के लिए दोषकारक होता है।
  • मुख्यद्वार के समक्ष कुआं होने से घरवालों को मिर्गी रोग हो सकता है।
  • अगर मार्ग भवन के मुख्यद्वार पर आकर खत्म होता हो तो यह भी द्वारवेध होता है। गृहस्वामी के लिए अशुभ होता है।
  • मुख्यद्वार के समक्ष मंदिर होना भी द्वारवेध होता है, इससे गृहस्वामी विनाश की और बढ़ता है।
  • मुख्यद्वार के सामने हमेशा पानी का बहना, धन का अपव्यय कराने वाला होता है।
  • प्रवेशद्वार के समक्ष कीचड़ रहने से घर शोक बना रहता है।
  • यह सभी द्वारवेध भवन की ऊंचाई के दोगुना दुरी पर स्थित है तो इनका प्रभाव नहीं होता।

खिड़कियाँ :

  • उत्तर दिशा में खिड़कियाँ परिवार में धन-धन्य की वृद्धि करती है और लक्ष्मी और कुबेर की दृष्टि बनी रहती है।
  • खिड़कियों का निर्माण सन्धि स्थल में नहीं होना चाहिए।
  • द्वार के समक्ष खिड़कियों को बनवाने से चुंबकीय चक्र पूर्ण होता है, घर में सुख शान्ति बने रहती है।
  • खिड़कियों की संख्या सम होनी चाहिए।
  • खिड़कियों के पल्ले अंदर की और खुलने चाहिए।
  • पश्चिमी, पूर्वी और उत्तरी दीवारों पर खिड़कियों का निर्माण करना शुभ होता है।
  • खिड़कियां सदैव दीवार में एक ही सीध में बनानी चाहिए।

बॉलकनी और बरामदा :

  • बॉलकनी और बरामदा खुले स्थान के अंतर्गत आते है।
  • उत्तर-पूर्व यानी ईशान कोण में बॉलकनी या बबरामदा अधिक रखना चाहिए।
  • पश्चिमी दिशा में बॉलकनी या बरामदा का निर्माण नहीं करवाना चाहिए।
  • दोमंजिला ईमारत में ऊपरी मंजिल में बॉलकनी और बरामदा पूर्व या उत्तर दिशा में रखना चाहिए।

पूजाघर :

  • ईशान कोण का स्वामी ईश को माना गया है।
  • पूजा घर ईशान कोण, पूर्व दिशा के मध्य और उत्तर दिशा के मध्य ही बनवाना चाहिए।
  • पूजास्थल का निर्माण इस प्रकार होना चाहिए की पूजा करने वाले व्यक्ति का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की और हो।
  • धार्मिक और वास्तु ग्रंथो के अनुसार धन प्राप्ति के लिए उत्तर दिशा की और मुख करके पूजा करनी चाहिए।
  • पूजाघर और ईशानकोण के निकट झाड़ू और कूड़ेदान नहीं रखना चाहिए।
  • ईशानकोण और पूजाघर में कभी भी धन और बहुमूल्य वस्तुएं नहीं छुपानी चाहिए।
  • पूजाघर में सदैव शुद्ध, पवित्र और स्वच्छ चीजे ही रखें।
  • पूजाघर में किसी प्राचीन मंदिर से लायी गयी प्रतिमा या स्थिर प्रतिमा की स्थापना नहीं रखनी चाहिए।
  • पूजास्थल का फर्श सफ़ेद अथवा हल्के पिले रंग का होना चाहिए।
  • पूजाघर की दीवारें सफ़ेद, हल्के पिले अथवा हल्के नीले रंग की होने चाहिए।

रसोईघर :

  • भवन में रसोईघर का निर्माण आग्नेय कोण में होना चाहिए।
  • स्थान के आभाव में पश्चिम दिशा में भी रसोईघर बनाई जा सकती है।
  • ईशान कोण में चूल्हा रखा जाना वर्जित है ऐसा करने से अर्थहानि होती है और वंश वृद्धि रुक जाती है।
  • रसोईघर की आठ दिशाओं और विदिशाओं को विभाजित करके चूल्हे की व्यवस्था आग्नेय कोण में ही की जानी चाहिए।
  • ईशान कोण और उत्तर दिशा के अतिरिक्त किसी और दिशा में चूल्हा रखने से कोई हानि नहीं होती।

भोजनकक्ष :

  • बड़े भवनों में भोजनकक्ष यानि की डाइनिंगरूम की व्यवस्था की जाती है।
  • भोजनकक्ष पश्चिम दिशा में बनाना उचित रहता है।
  • पश्चिम दिशा में भोजन करने से असीम सुख, शान्ति और संतोष प्राप्त होता है।
  • रसोईघर के अंदर ही भोजन करना हो तो रसोईघर की पश्चिम दिशा की और व्यवस्था होनी चाहिए।

शयनकक्ष :

  • बच्चों, अविवाहितों अथवा मेहमानों के लिए शयनकक्ष पूर्व दिशा में होना चाहिए।
  • गृह स्वामी का शयन कक्ष नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) कोण में होना चाहिए।
  • नैऋत्य कोण के शयन कक्ष होने से भवन में लम्बे समय तक निवास होता है।
  • शयनकक्ष में बिस्तर इस प्रकार लगाए ताकि सोते समय सिर पश्चिम अथवा दक्षिण दिशा में हो।
  • उत्तर दिशा की और सिर करके नहीं सोना चाहिए। ऐसा करने से नींद नहीं आती और बुरे सपने आते है।
  •  दक्षिण-पश्चिम या दक्षिण दिशा में स्थित शयनकक्ष विवाहिता और बच्चो के लिए उपयुक्त है।
  • शयनकक्ष का द्वार एक पल्ले का होना चाहिए।
  • पूर्वी और उत्तरी दिशा वाला शयनकक्ष स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है।

स्नानघर और शौचालय :

  • भवन  मुख्यद्वार उत्तर दिशा की और है, तो स्नानगृह पूर्व अथवा पूर्वी-आग्नेय कोण में बनाया जा सकता है।
  • अगर भवन का मुख्यद्वार पूर्व दिशा की और है, तो स्नानगृह पूर्वी-आग्नेय कोण में होना चाहिए।
  • स्नानगृह के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दिशा पूर्व होती है।
  • यदि शौचालय स्नानघर में ही बनना है तो स्नानघर के पश्चिम अथवा वायव्य कोण में बनाया जा सकता है।
  • स्नानगृह की दीवारों का रंग हल्का होना चाहिए जैसे सफ़ेद, हल्का नीला और आसमानी।
  • स्नानगृह का द्वार ठीक रसोईघर के सामने नहीं होना चाहिए।
  • स्नानघर का द्वार पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए।
  • शौचालय के द्वार पूर्व अथवा आग्नेय कोण की तरफ खुलना चाहिए।
  • शौचालय में एक खिड़की उत्तर, पश्चिम या पूर्व दिशा में होनी चाहिए।

नलकूप अथवा जलस्त्रोत :

  • नलकूप या भवन में प्रयोग लाये जाने वाले जल का स्त्रोत ईशान कोण में होना चाहिए।
  • भवन में जल ईशान कोण से ही आना चाहिए।
  • अगर हम म्यूनसिपल कॉपोरेशन का कनेक्शन ले रहे है तो भूखंड से कनेक्शन भी ईशान कोण से ही आना चाहिए।
  • मध्य भाग में कूप या गड्डा होने से गृहस्वामी का विनाश होता है।

पानी की टंकी :

  • पानी की टंकी का प्रयोग जल संग्रह के लिए किया जाता है।
  • छत पर रखी जानी वाली टंकी यानी ओवरहेड पानी की टंकी पश्चिम दिशा में राखी जानी चाहिए।
  • छत रखी जानी वाली टंकी दक्षिण दिशा या नैऋत्य कोण में बनानी चाहिए।
  • नैऋत्य कोण को राक्षसों का स्थान माना गया है, ऐसे स्थान पर भरी वजन वाली चीजें उसी स्थान पर स्थापित रखनी चाहिए।
  •  भूमिगत पानी टंकी पूर्व दिशा या ईशान कोण में बनाना उचित है।

स्वागतकक्ष :

  • स्वागतकक्ष पूर्व या उत्तर दिशा की और बनाना चाहिए।
  • इस कक्ष की व्यवस्था इस प्रकार होने चाहिए की घर के मुखिया का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की और होना चाहिए।
  • मेहमानों का मुख पश्चिम या दक्षिण की और होना चाहिए।
  • स्वागतकक्ष में रखें जाने वाला फर्नीचर वर्गाकार या आयातकार का होना चाहिए।
  • स्वागतकक्ष का द्वार वायव्य कोण, ईशान कोण या पूर्व दिशा में होना चाहिए।

सीढ़ियां :

  • सीढ़ियों के निचे कोई भी विशेष या महत्वपूर्ण कार्य नहीं करना चाहिए।
  • सीढ़ियों की ढाल पूर्व या उत्तर दिशा की और होनी चाहिए।
  • सीढ़ियां हमेशा विषम संख्या में बनानी चाहिए।
  • ईशान कोण में सीढ़ियां कभी ना बनवाएं।
  • सीढ़ियां पश्चिमी या दक्षिणी दीवार से मिली हुई बनानी चाहिए।
  • सीढ़ियों का द्वार पूर्व या दक्षिण दिशा में होना शुभ होता है।

यह सभी बातें ध्यान रखते हुए आप अपने भवन की रूप रेखा या नक्शा तैयार करवा सकते है।