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अहोई अष्टमी व्रत : कैसे करें अहोई आठे का व्रत? अहोई अष्टमी व्रत कथा

अहोई अष्टमी व्रत विधि और कथा

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सावन, भादो, आश्विन और कार्तिक साल के वो चार महीने हैं जिनमे सबसे अधिक हिन्दू पर्व मनाए जाते हैं। अहोई अष्टमी भी उन्ही में से एक है, जिसे कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। अहोई आठे का व्रत उसी वार को किया जाता है जिस वार को दीपावली होती है। अहोई अष्टमी व्रत करवा चौथ के 4 दिन बाद मनाया जाता है।

अहोई आठे के व्रत में भी महिलायें निर्जला उपवास रखती हैं, परन्तु यह उपवास उनकी संतान के लिए रखा जाता है। जिस प्रकार करवा चौथ में चाँद देखकर व्रत खोला जाता है, उसी प्रकार अहोई अष्टमी में तारे देखकर उपवास खोला जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत वो स्त्रियां करती हौं जिनकी संतानें होती हैं।

अहोई अष्टमी व्रत कैसे करें?

यह व्रत तारों को अर्घ्य देकर संपन्न किया जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत करने के लिए प्रातःकाल स्नान-आदि से निवृत होकर तैयार हो जाएं और पुरे दिन निर्जला उपवास रखें। शाम को दिवार पर अष्ट कोष्ठक की अहोई की पुतली बनाएं। उस पुतली के पास सेइ और सेइ के बच्चों का चित्र भी बनाएं। आप चाहे तो बाजार से अहोई अष्टमी का कैलेंडर लाकर भी दिवार पर लगा सकती हैं।

सूर्यास्त होने और तारे निकलने ओर अहोई माँ की पूजा करें। पूजन के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को साफ़ करके पवित्र कर लें। फिर एक कलश पर जल से भरा लोटा रखें। अब अहोई माता की पूजा करें और कहानी सुन लें।

अहोई अष्टमी व्रत में पूजा के लिए माताएं चांदी की अहोई बनवाती हैं, जिसे स्याऊ कहते हैं और उसमे चांदी के दो दाने (मोती डलवा लें) डलवा लें। उसके बाद डोरे में चांदी की होई और मोती डलवा लें।

उसके बाद अहोई माता की रोली, चावल, दूध और भात से पूजा करें। जल से भरे लोटे पर सतिया जरूर बना लें। अब एक कटोरी में हलवा और रूपए बायना निकाल कर रख लें। कहानी सुनने के लिए हाथ में गेहूं के सात दाने लें और कहानी सुनें।

कहानी सुनने के बाद अहोई स्याऊ की माला गले में पहन लें। बायना को अपनी सास या किसी बड़े को दें और पैर छूकर आशीर्वाद लें। उसके बाद तारों को कलश से अर्घ्य देकर पूजा करें और भोजन कर लें। दीपावली के बाद किसी शुभ दिन अहोई को गले से उतारकर उसपर गुड़ का भोग लगाएं और जल के छींटे देकर मस्तक झुकाकर रख दें।

जितने बेटे हैं उतनी बार और जितने बेटों का विवाह हो गया हो उतनी बार चांदी के दो-दो दानें अहोई में डालती रहें। ऐसा करने से अहोई माता प्रसन्न होती हैं और बच्चों को दीर्घायु प्राप्त होती है। अहोई अष्टमी के दिन पंडितों को पेठा दान करना बहुत शुभ होता है।

अहोई अष्टमी व्रत कथा

प्राचीन काल में एक साहुकार के सात बेटे और सात बहुएं थी। इस साहुकार की एक बेटी भी थी जो दीपावली में ससुराल से मायके आई थी। दीपावली पर घर को लीपने के लिए सातों बहुएं और ननद मिट्टी लाने जंगल गई। साहुकार की बेटी जहां मिट्टी काट रही थी, उस जगह पर स्याहु (साही) अपने सात बेटों से साथ रहती थी। मिट्टी काटते हुए गलती से साहूकार की बेटी की खुरपी के चोट से स्याहू का एक बच्चा मर गया। स्याहू इस पर क्रोधित होकर बोली मैं तुम्हारी कोख बांधूंगी।

स्याहू की बात से डरकर साहूकार की बेटी अपनी सातों भाभीयों से एक-एक कर विनती करती हैं कि वो उसके बदले अपनी कोख बंधवा लें। सबसे छोटी भाभी ननद के बदले अपनी कोख बंधवाने के लिए तैयार हो गई। इसके बाद छोटी भाभी के जो भी बच्चे होते हैं वे सात दिन बाद मर जाते हैं। इसके बाद उसने पंडित को बुलवाकर कारण पूछा तो पंडित ने सुरही गाय की सेवा करने की सलाह दी। उसके बाद से ही छोटी बहू ने सुरही गाय की सेवा करने लगी।

सेवा से प्रसन्न होकर सुरही गाय ने वरदान मांगा तो उसने कहा की – स्याऊ माता तुम्हारी भायली है और उसने मेरी कोख बांध रखी है। सो मेरी खोख खुलवा दो। गौ माता उसे उसको लेकर समुद्र पार भायली के पास चली।

रास्ते में बहुत थक जाने पर दोनों आराम करने लगते हैं। थोड़ी देर में एक सांप आया और गरूड़ पंखनी के बच्चे को डंसने जा रहा था तभी साहूकार की बहू देख लेती है और सांप को मार देती है। इतने में गरूड़ पंखनी वहां आ जाती है, और वहां खून पड़ा देखकर साहूकार की बहू को चोंच मारने लगती है। तब बहु बताते हैं की मैंने तेरे बच्चों को नहीं मारा सांप बच्चों को डंसने आया था और मैंने तेरे बच्चों को बचाया। ये देखकर गरुड़ पंखनी खुश होती है और सुरही सहित उन्हें स्याहु के पास पहुंचा देती है। वहां छोटी बहू स्याऊ की खूब सेवा करती हैं जिससे प्रसन्न होकर उसे सात पुत्र और सात बहु होने का अशीर्वाद देती है। स्याहु के आशीर्वाद से छोटी बहु का घर पुत्र और पुत्र वधुओं से हरा भरा हो जाता है।