हवन करने का तरीका, हवन कैसे किया जाता है?

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हवन का महत्व

हिन्दू परंपराओं के अनुसार, किसी भी पूजा पाठ, धार्मिक अनुष्ठान और शुभ कार्य सम्पन्न होने के पश्चात् हवन करना अनिवार्य होता है। माना जाता है बिना हवन उस कार्य का पूर्ण फल नहीं मिलता। इसलिए सभी शुभ काम सम्पन्न होने के बाद हवन कराया जाता है। हवन कराने से सकारात्मकता का संचार होता है, वातावरण शुद्ध हो जाता है। हवन से निकलने वाले धुंए से नकारात्मकता समाप्त हो जाती है। उस स्थान पर मौजूद बुरी शक्तियां भी दूर चली जाती है।

ऐसे तो सभी हवन कराने के लिए पंडित जी की मदद लेते हैं। लेकिन कुछ परिस्थितियों में व्यक्ति को खुद ही हवन करना पड़ता है। पर हवन करने की एक निश्चित विधि होती है, मंत्र होते हैं, एक तरीका होता है उसी के अनुसार हवन किया जाता है। सभी को इसके विषय में पूर्ण जानकारी नहीं होती जिसके चलते हवन सही तरीके से संपन्न नहीं हो पाता। आज हम आपको स्वयं हवन करने की विधि बता रहे हैं।

हवन करने की विधि

जिस भी स्थान पर हवन करना हो सबसे पहले उस स्थान को शुद्ध कर लें। बालू की वेदी का निर्माण करें। वेदी का पंचभू संस्कार करें।

  • तीन कुशों से वेदी को दक्षिण से उत्तर की ओर परिमार्जन करें तथा कुशों को ईशान कोण में फेंक दें।
  • वेदी को जल और गोबर से लीप दें।
  • वेदी पर कुशः से पश्चिम से पूर्व तीन रेखाएं तथा दक्षिण से उत्तर की ओर खींचें।
  • अनामिका और अंगूठे से रेखाओं पर से मिट्टी निकालकर उत्तर की ओर ओर फेंकें।
  • अग्नि स्थापित करें। और इस मंत्र का जप करें –

ॐ अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे।
देवॉं२ आ सादयादिह ॥

  • अग्नि प्रज्वलित कर उसका ध्यान करें।

ॐ मुखं यः सर्वदेवानां हव्यभुक् कव्यभुक तथा,
पितृणां च नमस्तुभ्यं विष्णवे पावकात्मने ।।
ॐ अग्ने शांडिल्य गौत्र मेषध्वज परामुख मम सन्मुखो भव ।

  • अग्नि की पूजा करें।

इदं गंधं समर्पयामि ॐ पावकाग्नये नमः।
इदं पुष्पं समर्पयामि ॐ पावकाग्नये नमः।।
इदं धूपं समर्पयामि ॐ पावकाग्नये नमः।
इदं दीपं दर्शयामि ॐ पावकाग्नये नमः।
इदं नैवेद्यं निवेदयामि ॐ पावकाग्नये नमः।

  • इसके बाद घृत से अथवा घृतमिश्रित हविष्यान्न से हवन करें।
  • सर्वप्रथम अग्नि के जलते अंश पर तीन आहुति दें –

ॐ भूः स्वाहा, इदमग्नये न मम।
ॐ भुवः स्वाहा, इदं वायवे न मम।
ॐ स्वः स्वाहा, इदं सूर्याय न मम।

  • अब आगे के मंत्रों से आहुतियां दें –

ॐ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये न मम।
ॐ धन्वंतरये स्वाहा, इदं धन्वन्तरये न मम।
ॐ विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा, इदं विश्वेभ्यो देवेभ्यो न मम।
ॐ प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये न मम।
ॐ अग्नये स्विष्ट कृते स्वाहा, इदमग्नये स्विष्टकृत न मम।

  • प्रणाम करें।

यथा बाण प्रहाराणां कवचं वारकं भवेत,
तद्वद्दैवोपघातां च शान्तिर्भवति वारिका।
शान्तिरस्तु, पुष्टिरस्तु, तुष्टिरस्तु, वृद्धिरस्तु,
यत् पापं तत् प्रतिहस्तमस्तु, द्विपदे चतुष्पदे सुशांतिर्भवतु।

  • अग्नि की प्रार्थना पर –

ॐ सप्त ते अग्ने समिधः सप्त जिह्वाः सप्त ऋषयः
सप्त धाम प्रियाणि । सप्त होत्राः सप्तधा त्वा यजन्ति
सप्त योनीरा पृणस्व घृतेन स्वाहा ॥

  • अंत में हवन कर्म भगवान को अर्पित करें –

अनेन होम कमर्ण श्री परमेश्वरः प्रीयताम न मम्।

  • सभी देवताओं से क्षमायाचना पुष्प अक्षत लेकर करें –

ॐ अज्ञाना द्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम्,
विपरीतं च तत्सर्वं क्षमस्व पर्वेश्वर॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनं,
पूजा चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वर॥
अपराध सहस्रणि क्रियते अहर्निशं मया,
दासोयमिति मां ज्ञात्वा क्षमस्व जगदीश्वर॥

  • पुष्प अक्षत देकर शंख घंटा वादन करें।

यान्तु देवगणां सर्वे पूजामादाय मामकीम्‌,
पुजाराधन कालेषु पुनराय गमनाय च।
ॐ गच्छ गच्छ परं स्थानं स्व धामं परमेश्वर,
आवाहनस्य समये यथा स्यात्पुनरागमः॥
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु।
न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव ! परिपूर्ण तदस्तु में॥

  • ब्राह्मण को दक्षिणा दें।

ॐ कृतै तत् पंचदेव सहित
देवता पूजन कर्मणः साङ्गता सिद्धयर्थ
ब्राह्मणाय यथाशक्ति दक्षिणां सम्प्रददे॥

तत्पश्चात अपने इष्ट की आरती करें और सबको प्रसाद जरूर दें।