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कांवड़ यात्रा का क्या महत्व है और कांवड़ यात्रा कब शुरू हुई

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कांवड़ की यात्रा श्रावण मास यानी की सावन के महीने में की जाती है। यह प्रथा भगवान् परशुराम ने शुरू की थी। उन्होंने यह परम्परा अपने आराध्य देव भगवान् शिव के लिए शुरू की थी, और तभी से यह परम्परा पूरे विश्व भर में प्रचलित है। सावन के महीने में लोग कांवड़ लेने के लिए घर से निकलते है और शिवरात्रि के दिन भगवान् भोलेबाबा का जलाभिषेक करते है। इस महीने में शिव को श्रावण का सोमवार विशेष रूप से प्रिय है। इसीलिए लोग सोमवार को शिव का पूजन बेलपत्र, भांग, धतूरे, लाल कनेर के पुष्पों से पूजन करते है।

ऐसा माना जाता है की कावंड़िये कांवड़ लेकर अपने भोलेबाबा को प्रसन्न करने की कोशिश करते है, और यह भी उनकी आस्था को दिखाने का एक तरीका होता है। और यह केवल पुरुष ही नहीं बल्कि कई महिलाएं और बच्चे भी कांवड़ यात्रा में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते है। और इस महीने में हर जगह कांवड़ियों की धूम देखने को मिलती है। हर जगह पर कांवड़ियों के लिए भंडारे व् आराम का प्रबंध किया जाता है।

भारत में अलग अलग जगह पर कांवड़ को लेकर अपनी मान्यता है। सभी लोग उनके आस पास के तीर्थ स्थान से जल लाकर भोलेबाबा का जलाभिषेक करते है। जैसे की ज्यादातर उत्तर भारत के लोग भी कांवड़ लाते है, और हरिद्वार से जल लाते है, राजस्थान के मारवाड़ी समाज के लोगों के यहां गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बदरीनाथ आदि जाते है। तो आइये अजा हम आपको विस्तार से बताते है की कांवड़ यात्रा का क्या महत्व है और कांवड़ यात्रा कब शुरू हुई थी।

कांवड़ यात्रा कब शुरू हुई थी:-

कांवड़ यात्रा की शुरुआत सबसे पहले शुरुआत भगवान् परशुराम जी ने की थी। पुरा महादेव में जो उत्तर प्रदेश प्रांत के बागपत के पास मौजूद है, भगवान् परशुराम ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगा जी का जल लाकर उसमे स्थित पुरातन शिवलिंग पर जाकर उसका जलाभिषेक किया था। और आज भी यह परम्परा लोगो द्वारा वैसे ही चलती आ रही है लेकिन वर्तमान में उस जगह का नाम ब्रजघाट है। जहां से लोग जल लाकर भोलेबाबा का जलाभिषेक करते है।

कांवड़ यात्रा का महत्व:-

कांवड़ यात्रा जो की श्रावण मास में की जाती है, इसका बहुत ही अधिक महत्व है। लाखो श्रद्धालु आज भी भोलेबाबा को प्रसन्न करने के लिए पैदल गंगा जी का जल लेकर आते है और उससे भोलेबाबा का जलाभिषेक करते है। उत्तर भारत में भी गंगा जी के किनारे स्थित प्रदेशों में कांवड़ का बहुत महत्व है, इस दौरान सभी कांवड़िये केसरिया रंग के कपडे धारण करते है, और हर जगह बोल बम के नाम की धूम मची हुई होती है।

कांवड़ यात्रा का पौराणिक तथा सामाजिक दोनों रूप से महत्व है। एक तो हिमालय से लेकर दक्षिण तक संपूर्ण देश की संस्कृति में भगवान का संदेश जाता था और साथ ही अलग अलग क्षेत्रों की लौकिक और शास्त्रीय परंपराओं के आदान-प्रदान की जानकारी का पता चलता था। लेकिन समय के साथ अब इस परंपरा में परिवर्तन आ गया है। अब लोग गंगा जी अथवा मुख्य तीर्थों के पास से बहने वाली जल धाराओं से जल भरकर श्रावण मास में भगवान का जलाभिषेक करते हैं।

लोगो द्वारा कांवड़ को भी शिव की आराधना का ही एक रूप माना जाता है। कांवड़ का अर्थ होता है “परात्पर शिव के साथ विहार”। और सावन के इस महीने में शिव की महिमा का गुणगान करने के लिए लोग कांवड़ यात्रा करते है। जो लोग पैदल नहीं चलते है वो लोग बाइक या अन्य किसी साधन का सहारा भी लेते है। कांवड़ शिव के उन सभी रूपों को नमन है, और श्रद्धालु कंधे पर गंगलजल को लेकर इसी आस्था और विश्वास को जीते हैं। और शिव के परैत आस्था दिखाने के लिए उनका जलाभिषेक भी करते है।

तो इस साल 2018 में सावन का महीना 28 जुलाई से शुरू हो रहा है। साथ ही आप भी अपने एरिया के आस पास कांवड़ियों की धूम का आनंद ले सकते है। साथ ही भोलेबाबा का जलाभिषेक करके उनका आशीर्वाद पा सकते है। तो इस सावन आप भी भोलेबाबा की जयकार लगाकर उनका आशीर्वाद पा सकते है।