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मंत्र सिद्धि कैसे होती है?

मंत्र क्या है?

मंत्र शब्दों का संचय होता है, जिससे व्यक्ति अपने इष्ट को प्राप्त कर सकता है और अनिष्ट बाधाओं को नष्ट कर सकता है। मूल रूप से मंत्र शब्द का अर्थ ‘गुप्त परामर्श’ होता है। श्रद्धा से जब मंत्राक्षर अन्तदृंश में प्रवेश कर एक दिव्य आहिण्डन करते है, तब एक जीवंत ज्वलंत एवं जागृत रूप चमक उठता है। और यही दिव्य रूप साकार होकर सिद्धि में परिणित हो जाता है –

मंत्रे तीर्थे द्विजे दे वे दैवज्ञे भैषजै गुरौ।
यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी॥

मंत्र और सिद्धि परस्पर जुड़े हुए शब्द है, पर इसके लिए कई तथ्यों को ध्यान में रखते हुए उनका सम्यक पालन आवश्यक है। विधिवत् पालन न करने से इसमें असफलता मिलती है, फलस्वरूप अश्रद्धा उत्पन्न होती है, इसीलिए महर्षियों ने कहा है –

‘‘एतद् गोप्यं महागोप्यं न देयं यस्य कस्यचित्।।’’

मंत्र शब्द ही अपने आपमें सारगर्भित है, इस संबंध में कहा गया है –मंत्र सिद्धि

‘मनमात त्रायेत यस्मात्त्स्मान्मंमंत्र प्रकीर्तितः’ अर्थात ‘म’ कार से मनन और त्र कार से रक्षण अर्थात जिन विचारों से या कार्यों से हमारे कार्य सिद्ध हों उसे मंत्र कहते है, मन में जब वर्णोच्चार का घर्षण होता है तब तक एक दिव्य ज्योति प्रगट होती है। और इसी से सफलता प्राप्त होती है।

मांत्रिकों के अनुसार निरंतर मंत्र जाप करते रहना ही सिद्धि है, ‘जपात्सिद्धिर्ज्पात्सिद्धिः’ जपते ही चले जाओं निश्चय ही सफलता मिलेगी।

मंत्र साधना में सफलता का मूल आधार चित्त की एकाग्रता है, इसीलिए उच्चस्तरीय साधक अपने योग्यतम शिष्य को श्यामा पीठिका में दीक्षित करते है। जो साधक श्यामा पीठिका सिद्ध कर लेता है, वेह निश्चय ही स्वयं मंत्र का रूप हो जाता है।

मंत्र शास्त्र में चार पीठिकाओं का उल्लेख है –

1. शमशान पीठ 
2. शव पीठ 
3. अरण्य पीठ 
4. श्यामा पीठ

1. शमशान पीठ : कुछ ऐसे मंत्र होते है, जो रात्रि में शमशान में जाकर जपे जाते है। ऐसे मंत्रों को श्मशान पीठ कहा जाता है।

2. शव पीठ : किसी मृत कलेवर के ऊपर बैठकर या उसके भीतर घुसकर मंत्र-जप साधना शव पीठ कहलाती है। तांत्रिक साधना में इसका विशेष महत्त्व है।

3. अरण्य पीठ : जहां लोगों का आवागमन न हो, कोलाहल से दूर जंगल में, किसी वृक्ष के नीचे या शून्य मंदिर में मंत्र जप को अरण्य पीठिका कहा जाता है।

4. श्यामा पीठ : यह सबसे कठिन पीठिका है, बिरला ही इस पीठिका से उत्तीर्ण हो सकता है। एकांत स्थान में द्वार बंद कक्ष या निर्जन स्थान में षोडश वर्षीय नवयौवन सुन्दर स्त्री को वस्त्ररहित सन्मुख बिठाकर जो साधक बिना विचलित हुए पूर्ण एकात्म भाव से मंत्र जप करे, उसे श्यामा पीठिका कहते है।

जैसा की कई बार उल्लेख किया जा चुका है, कि साधक को योग्य गुरु के सानिध्य में ही साधना करनी चाहिए। गुरु का आत्मदान और शिष्य का आत्मसमर्पण इन दो धाराओं के मिलन से ही सिद्धि प्राप्त होती है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक इष्ट फलप्रद नहीं होता, और न प्रत्येक मंत्र ही शीघ्र साध्य होता है। अतः यह गुरु के द्वारा ही ज्ञात हो सकता है, की कौन सा मंत्र अमुक साधक के लिए उपयुक्त है और कौन से इष्टदेव की साधना शीघ्र शुभ फलप्रद है?

मंत्र सिद्धि कैसे की जाती है?

मंत्र को सिद्ध करने के दो उपाय है – जात सूतक निवृत्ति और मृत सूतक निवृत्ति।

1. जात सूतक निवृत्ति : इसके लिए जप के प्रारंभ से एक सौ आठ बार ॐ कार से पुटित करके इष्ट मंत्र का जप करना चाहिए।

2. मृत सूतक निवृत्ति : इसके लिए भूत लिपि विधान करे।

नियम :

1. इस प्रकार नित्य एक हजार जप एक महीने तक करने से ही मंत्र जागरित होता है।

2. पूर्व में तीन प्राणायाम और अंत में भी तीन प्राणायाम करने चाहिए।

3. प्राणायाम का नियम यह है की चार मंत्र से पूरक, सोलह मंत्र से कुंभक और आठ मंत्र से रेचक करना चाहिए।

4. जप पूरा होने पर मानसिक रूप से उसे इष्ट देवता के दाहिने हाथ में समर्पित कर लेना चाहिए। यदि देवी इष्ट स्वरुप हो तो उसके बाएं हाथ में समर्पित करना चाहिए।

5. प्रतिदिन अनुष्ठान के अंत में जप का दंशांश हवन, हवन का दंशांश तर्पण, तर्पण का दंशांश अभिषेक और यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन करना चाहिए।

6. यदि नियम संख्या पांच का पालन किसी वजह से संभव न हो सके तो जितना होम हुआ है, उससे चौगुना जप ब्राह्मणों को, छः गुना क्षत्रियों को तथा आठ गुना वैश्य को करना चाहिए।

7. अनुष्ठान के 5 अंग : जप, होम, तर्पण, अभिषेक और ब्राह्मण भोजन।

यदि होम तर्पण अभिषेक न हो तो ब्राह्मण या गुरु के आशीर्वाद मात्र से भी ये कार्य सम्पन्न माने जा सकते है।

8. स्त्रियों को होम-तर्पण आदि की आवश्यकता नहीं है। केवल मात्र से ही उन्हें सफलता मिल जाती है।

9. अनुष्ठान पूर्ण होने तक प्रत्येक विधि से गुरु को संतुष्ट एवं प्रसन्न करे।