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नीलम स्टोन धारण करने की विधि और मन्त्र

नीलम रत्न शनि गृह का प्रतिनिधि रत्न है, यह एक अत्तयंत प्रभावशाली रत्न होता है। शनि ग्रह के बुरे प्रभाव और पीड़ा शांत करने के लिए नीलम (Neelam) या नीला पुखराज धारण करना चाहिए। नीलम को हीरे के बाद दूसरा सबसे सुंदर रत्न माना जाता है। इसे नीलमणि, सेफायर, इंद्र नीलमणि, याकूत, नीलम, कबूद भी कहा जाता है। कहा जाता है कि यह रत्न रंक को राजा और राजा को रंक बना सकता है। आप किसी अच्छे विद्वान् से दिखाकर ही नीलम धारण करें, जिसके कुंडली में शनि का प्रकोप है उसको ही नीलम धारण करनी चाहिए।

नीलम धारण करने की विधि:-

नीलम शनिवार के दिन धारण करना शुभ माना जाता है। आप शनिवार के सुबह नहा धोकर पवित्र हो जाएँ, फिर अपने घर के मंदिर के पास ही बैठ जाएँ, एक कटोरी में कच्चा दूध, उसमे चीनी या मिश्री थोड़ा शहद, और गंगा जल डाल लें, फिर उसमे अपनी अंगूठी करीब २० – से ३० मिनट तक रख दें, अब आपके पास जो समय है उस समय में पीपल में वृक्ष में जल दे आयें, जल में काली तील, चीनी और कच्चा थोड़ा दूध ले लें,  वापस आ कर  गंगा जल से अन्गुती को धोकर चन्दन, अक्षत और सुगन्धित धुप अगरबती दिखा दें।

नीलम धारण करने का मंत्र :-

ॐ शं शनिश्चराय नम:

प्रेम भाव से बैठकर का जाप करें, (११, २१, ५१, १०८ जाप),  फिरअगरबत्ती के उपर से घुमाये, फिर  प्रार्थना करे हे शनि देव में आपका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आपका प्रतिनिधि रत्न धारण कर रहा हूँ कृपा करके मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान करे! फिर अंगूठी को मध्यमा ऊँगली में धारण करे! उसके बार शनि चालीसा पढ़ें।

उसके बाद करीब पांच शनिवार को पीपल में जल डालने और शाम को पीपल के पास आंटे का दीपक में सरसों तेल से जलाएं और दीपक में काली तील और उड़द और कील (लोहा) जरुर डालें।

नीलम धारण करने के फायदे:-

अगर पहनने पर शुभ सिद्ध हो तो शनि के कष्टों से छुटकारा मिलेगा,  और यह रत्न  अपार सम्पति दिलाने वाला होता है रोग, दोष, दुख, दरिद्रता आदि नष्ट होकर धन धान्य सुख सम्पति, बल बुद्धि यश आयु एंव कुछ संतान की वृद्धि, होती है नष्ट हुआ धन वापस मिलता है तथा मुख के तेज एवं नेत्र ज्योति में वृद्धि होती है ।

श्री शनि चालीसा  और इसका महत्व :

शनि प्रभावित जातकों के समस्त कष्टों का हरण शनि चालीसा के पाठ द्वारा भी किया जा सकता है। सांसारिक किसी भी प्रकार का शनिकृत दोष, विवाह आदि में उत्पन्न बाधाएं इस शनि चालीसा की 21 आवृति प्रतिदिन पाठ लगातार 21 दिनों तक करने से दूर होती हैं और जातक शांति सुख सौमनस्य को प्राप्त होता है। अन्य तो क्या पति-पत्नी कलह को भी 11 पाठ के हिसाब से यदि कम से कम 21 दिन तक किया जाये तो अवश्य उन्हें सुख सौमनस्यता की प्राप्ति होती है।

शनि वार
श्री शनि चालीसा

दोहा

जय-जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महराज।
करहुं कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज।।

चौपाई

जयति-जयति शनिदेव दयाला।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला।।
चारि भुजा तन श्याम विराजै।
माथे रतन मुकुट छवि छाजै।।
परम विशाल मनोहर भाला।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला।।
कुण्डल श्रवण चमाचम चमकै।
हिये माल मुक्तन मणि दमकै।।
कर में गदा त्रिशूल कुठारा।
पल विच करैं अरिहिं संहारा।।
पिंगल कृष्णो छाया नन्दन।
यम कोणस्थ रौद्र दुःख भंजन।।
सौरि मन्द शनी दश नामा।
भानु पुत्रा पूजहिं सब कामा।।
जापर प्रभु प्रसन्न हों जाहीं।
रंकहु राउ करें क्षण माहीं।।
पर्वतहूं तृण होई निहारत।
तृणहंू को पर्वत करि डारत।।
राज मिलत बन रामहि दीन्हा।
कैकइहूं की मति हरि लीन्हा।।
बनहूं में मृग कपट दिखाई।
मात जानकी गई चुराई।।
लषणहि शक्ति बिकल करि डारा।
मचि गयो दल में हाहाकारा।।
दियो कीट करि कंचन लंका।
बजि बजरंग वीर को डंका।।
नृप विक्रम पर जब पगु धारा।
चित्रा मयूर निगलि गै हारा।।
हार नौलखा लाग्यो चोरी।
हाथ पैर डरवायो तोरी।।
भारी दशा निकृष्ट दिखाओ।
तेलिहुं घर कोल्हू चलवायौ।।
विनय राग दीपक महं कीन्हो।
तब प्रसन्न प्रभु ह्नै सुख दीन्हों।।
हरिशचन्द्रहुं नृप नारि बिकानी।
आपहुं भरे डोम घर पानी।।
वैसे नल पर दशा सिरानी।
भूंजी मीन कूद गई पानी।।
श्री शकंरहि गहो जब जाई।
पारवती को सती कराई।।
तनि बिलोकत ही करि रीसा।
नभ उड़ि गयो गौरि सुत सीसा।।
पाण्डव पर ह्नै दशा तुम्हारी।
बची द्रोपदी होति उघारी।।
कौरव की भी गति मति मारी।
युद्ध महाभारत करि डारी।।
रवि कहं मुख महं धरि तत्काला।
लेकर कूदि पर्यो पाताला।।
शेष देव लखि विनती लाई।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई।।
वाहन प्रभु के सात सुजाना।
गज दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना।।
जम्बुक सिंह आदि नख धारी।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी।।
गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं।
हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं।।
गर्दभहानि करै बहु काजा।
सिंह सिद्धकर राज समाजा।।
जम्बुक बुद्धि नष्ट करि डारै।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै।।
जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी।
चोरी आदि होय डर भारी।।
तैसहिं चारि चरण यह नामा।
स्वर्ण लोह चांदी अरु ताम्बा।।
लोह चरण पर जब प्रभु आवैं।
धन सम्पत्ति नष्ट करावैं।।
समता ताम्र रजत शुभकारी।
स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी।।
जो यह शनि चरित्रा नित गावै।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै।।
अद्भुत नाथ दिखावैं लीला।
करैं शत्राु के नशि बल ढीला।।
जो पंडित सुयोग्य बुलवाई।
विधिवत शनि ग्रह शान्ति कराई।।
पीपल जल शनि-दिवस चढ़ावत।
दीप दान दै बहु सुख पावत।।
कहत राम सुन्दर प्रभु दासा।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा।।

दोहा 

प्रतिमा श्री शनिदेव की, लोह धातु बनवाय।
प्रेम सहित पूजन करै, सकल कष्ट कटि जाय।।
चालीसा नित नेम यह, कहहिं सुनहिं धरि ध्यान।नि ग्रह सुखद ह्नै, पावहिं नर सम्मान।।