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कांवड़ यात्रा और इसका महत्व, कांवड़ यात्रा के नियम, 2018 की कांवड़ यात्रा

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हर साल सावन (श्रावण माह) में चतुर्दशी के दिन यह पर्व मनाया जाता है. हजारों की संख्या में शिवभक्त कांवड़ में केसरिया वस्त्र पहनकर कंधों पर कांवड़ लेकर ऋषिकेश, हरिद्वार, गोमुख आदि जगहों पर जाकर पवित्र गंगा जल लाते है और घर आकर शिवरात्रि के दिन अपने घर के पास वाले शिव मन्दिर में जाकर शिवलिंग का अभिषेक उसी गंगा जल से करते है. ऐसा मानना है कि सावन के महीने में भगवान शंकर की आराधना करने से मनोवंछित फल मिलता है।

कांवड़ यात्रा पूरे भारत देश में बहुत लोकप्रिय है. उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, मध्यप्रदेश, बिहार में यह उत्सव प्रमुख रूप से मनाया जाता है. भक्त “बोल बम” “हर हर महादेव” जैसे नारे लगाते है. हर तरफ खुशियों का माहौल होता है. चारो तरफ हरियाली होती है. ऐसे में सावन की फुहारे चार चाँद लगा देती है. शिवभक्त  भांग, बेलपत्र, धतूरे, फूलों, दूध, चीनी आदि को गंगाजल में मिलाकर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं. ऐसा करने से सभी मनोकामनाये पूरी होती हैं. इस पर्व को उत्तर भारत में विशेष रूप से गंगा नदी के किनारे स्तिथ स्थानों में मनाया जाता है. भक्त गंगा नदी तक पैदल यात्रा करते है, गंगा का पवित्र जल लेकर आते है और उसी से शिवलिंग का अभिषेक करते है.

ऐसा माना जाता है सावन के महीने में सभी देवता निद्रा में चले जाते हैं. सभी का काम भगवान शिव को ही करना पड़ता है. कांवड़ यात्रा अन्य यात्राओं की तुलना में आसान है और इसमें खर्च भी कम होता है. इसलिए हर वर्ग का व्यक्ति इसे करता है. कुछ भक्त तो उत्तर भारत में हिमालय के गोमुख का पवित्र गंगा जल लेकर दक्षिण भारत में तमिलनाडु राज्य में स्तिथ रामेश्वरम मंदिर तक की यात्रा करते है जिसमे 6 महीने तक का समय लग जाता है. वे रामेश्वरम मन्दिर में बनी हुई शिवलिंग का अभिषेक करते है. सावन का महीना आते ही शिव मंदिरों का ताँता लग जाता है.

कांवड़ यात्रा का इतिहास, कैसी शुरु हुई

यह यात्रा कैसे अस्तित्व में आई हम आपको बतायेंगे. समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला तो कोई भी उसे पीने को तैयार न था. इसलिए भगवान शंकर ने सारा विष पी लिया. इससे उनका शरीर जलने लगा. इसलिए सभी देवताओं ने उनके उपर ढेर सारा जल डालकर उनको शीतल किया, शांत किया. तभी से यह शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परम्परा बन गयी. कांवड़ यात्रा इसी तरह शुरु हुई.

किसने की पहली कांवड़ यात्रा

पहली कांवड़ यात्रा भगवान परशुराम ने की थी. श्रवणकुमार ने अपने अंधे माँ- पिता को कांवड़ में उठाकर सावन के महीने में यह यात्रा की थी. अपने माँ-पिता को तीर्थ पर ले गये थे.

कठिन है यह यात्रा

इस यात्रा में भक्त भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिये नंगे पैर कांवड़ कंधे पर रखकर सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करते है जिससे उनके पैर छिल जाते है और घाव बन जाते है. इसलिए यह यात्रा बेहद कठिन होती है. इसमें भक्तों की श्रद्धा की परीक्षा हो जाती है. इस यात्रा के दौरान कांवड़ को जमीन पर नही रख सकते है.

कांवड़ यात्रा के नियम-

  • इस यात्रा में किसी भी प्रकार का नशा करने की मनाही है. शराब नही पी सकते है.
  • मांस का सेवन इस यात्रा के दौरान वर्जित है.
  • कांवड़ को जमीन पर नही रख सकते हैं
  • चमड़े से बने सामान, वस्त्रो को छूना, धारण करना मना है.
  • यात्रा में “बोल बम” “हर हर महादेव” के नारे लगाना चाहिये
  • इस यात्रा को पैदल ही करना चाहिये. वाहन पर सवार होकर यात्रा करने से पुण्य नही मिलता है

प्रमुख मंदिर जहाँ कांवड़ यात्रा के बाद जल चढ़ाते है।

  • बैजनाथ धाम ,झारखण्ड
  • बटेश्वर मंदिर, आगरा
  • महाकाल मंदिर, उज्जयनी
  • गंगोत्री
  • यमुनोत्री
  • बद्रीनाथ
  • रामेश्वरम
  • पुरामहादेव

सावन के महीने में होने वाली यात्रायें

  • बाबा अमरनाथ की यात्रा
  • कैलाश मानसरोवर की यात्रा
  • ओम पर्वत, आदि कैलाश की यात्रा
  • कांवड़ यात्रा

आधुनिक भारत में कांवड़ के बदला रूप

  • झूला कांवड़
  • खड़ी कांवड़
  • झांकी वाली कांवड़- इस प्रकार की यात्रा में कोई बड़ा सा वाहन जैसे बस, टैम्पो, ट्राली, ट्रेक्टर, ट्रक ले लेते है. उसने भोलेनाथ की बड़ी सी मूर्ति लगा दी जाती है और बहुत सुंदर झांकी बनाई जाती है. फूलों से सजावट की जाती है. लाईट लगाई जाती है. DJ पर भोले के गीत रंग जमा देते है. सब तरह भक्त जोर जोर से ‘बम बोले’ का उद्घोष करते है. देखने लायक दृश्य होता है. जब इस तरह की झांकी गाँव, शहरों, सडकों से निकलती है तो सब लोग देखने लग जाते हैं.
  • डाक कांवड़- इस प्रकार के कांवड़ में किसी जीप, गाड़ी, टैम्पो या बस में कांवड़ियों का 10 से 15 लोगो का ग्रुप शामिल हो जाता है. वाहन में बड़ा सा DJ लगा होता है जिसमे भोलेनाथ के भक्ति वाले गाने बज रहे होते है. सभी तरह की खाने, पीने की व्यवस्था उस गाडी, बस, ट्रक में ही होती है. इस तरह की डाक कांवड़ का फायदा है की दूर दूर के पवित्र तीर्थ जैसे गोमुख, हरिद्वार, ऋषिकेश आदि स्थानों की भी कांवड़ यात्रा की जा सकती है.
  • साइकिल, स्कूटर या बाइक वाली कांवड़- इस तरह की कांवड़ में अधिकतर 1 ही व्यक्ति होता है जो अपनी सुविधानुसार साईकिल या स्कूटर, बाइक पर यात्रा करता है. गंगा जल डिब्बो में भरकर वाहन पर ही टाँगे रहता है. कई कई किमी तक पैदल चलना एक दुष्कर कार्य होता है, सभी नही कर पाते है इसलिए ये बाइक, स्कूटर और साइकिल पर कांवड़ यात्रा आजकल बहुत प्रचलित हो गयी है. हजारो कांवड़ अब इस तरह से अपनी यात्रा पूरी करते हैं.

कांवड़ यात्रा 2018 कब हैं-

28 जुलाई 2018 से सावन माह शुरू है। अपने अपने क्षेत्र के अनुसार कांवड़ यात्रा पर भक्त जाते हैं।

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 तारीख  दिन  पर्व
 28th जुलाई 2018  शनिवार  सावन माह का पहला दिन
 30th जुलाई 2018  सोमवार  सावन सोमवार व्रत
 06th अगस्त 2018  सोमवार  सावन सोमवार व्रत
 13th अगस्त 2018  सोमवार  सावन सोमवार व्रत
 20th अगस्त 2018  सोमवार  सावन सोमवार व्रत
 26th अगस्त 2018  रविवार  सावन माह का अंतिम दिन

 

सावन पूर्णिमा कब है? सावन पूर्णिमा दिन तिथि सावन पूर्णिमा पर व्रत त्यौहार

26th अगस्त 2018  रविवार  श्रावण पूर्णिमा  गायत्री जयंती, राखी, रक्षा बंधन, श्रवण पूर्णिमा

निष्कर्ष: कांवड़ यात्रा बहुत ही भक्तिमय यात्रा है और इसे करके भगवान शंकर को प्रसन्न कर सकते है. आजकल इसका स्वरुप दिन पर दिन बदलता जा रहा है. सभी को यह पवित्र यात्रा जरुर करनी चाहिये. कुछ यात्री इस यात्रा के दौरान भोले के प्रसाद के नाम पर भांग, गांजा व दूसरी नशीली चीजो का सेवन करते है. फिर वो दूसरे लोगो को बुरा भला कहते है, लड़ाई- झगड़ा, मारपीट करते हैं, बसों, ट्रेनों को रोककर उत्पात मचाते हैं जो कि पूरी तरह से गलत है. ऐसा बिलकुल नही करना चाहिये. इस यात्रा को शुद्ध मन और विचार से करना चाहिये.