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सूर्य को जल देने का क्या नियम होता है?

सूर्य को जल देने का नियम

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सूर्य को जल देना

हिन्दू धर्म में सूर्य ग्रह को पिता का दर्जा दिया जाता है। कुंडली में सूर्य की शुभ अशुभ स्थिति व्यक्ति के जीवन को प्रभावित करती है। सही तरह से जीवन यापन करने के लिए कुंडली में सूर्य ग्रह का मजबूत होना आवश्यक होता है।

सूर्य की कमजोर स्थिति

सूर्य कमजोर होने पर या सूर्य दोष होने पर व्यक्ति को असाध्य रोगों के कारण परेशानी होती है, सिर दर्द की समस्या रहती है, बुखार बना रहता है, नेत्र संबंधी समस्याएं हो जाती है, सरकारी विभाग से परेशानी होती है, नौकरी में बाधाएं आने लगती है और जीवन में काफी परेशानियां आने लगती है। ऐसे में सूर्य को मजबूत करने के लिए ज्योतिष शास्त्र में दिए गए उपायों का प्रयोग करना लाभप्रद होता है।

शास्त्रों के अनुसार, जिन जातकों की कुंडली में सूर्य की स्थिति ठीक ना हो या उनका ताप बहुत अधिक हो तो जातक को सूर्य को जल चढ़ाने की सलाह दी जाती है। ताकि सूर्य का ताप कम हो सके और शांति हो।

सूर्य को जल चढ़ाना

हिन्दू धर्म की परंपराओं के अनुसार, अधिकतर लोग सूर्य को नियमित रूप से जल चढ़ाते हैं लेकिन उसके बाद भी कोई खास परिणाम नहीं मिलते। जिसके चलते लोग उपाय करना छोड़ देते हैं।

सूर्य को जल अर्पित करना एक ज्योतिष शास्त्र उपाय है जिसे सही ढंग से किया जाना अनिवार्य होता है। गलत तरीके से या नियमों की अनदेखी होने पर अक्सर उपाय करने के बावजूद उचित परिणाम नहीं मिलते। ऐसे में जरुरी है की आप नियमों को जानें। आज हम आपको सूर्य को जल चढ़ाने के नियम बता रहे हैं। सूर्य को जल चढ़ाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए?

सूर्य को जल चढ़ाने के नियम

शास्त्रों में सूर्य को जल अर्पित करने के कुछ नियम बनाए गए हैं। जातक को उन्ही के अनुसार सूर्य को जल देना चाहिए, अन्यथा जल देने का कोई लाभ नहीं मिलता।

पहला नियम

सूर्य देव को जल कभी भी बिना स्नान किये नहीं देना चाहिए। हमेशा स्नान के पश्चात् ही सूर्य को जल चढ़ाना चाहिए।

दूसरा नियम

सूर्य को जल प्रातः 8 बजे से पूर्व जल दे देना चाहिए। तभी जल देना लाभकारी होता है।

तीसरा नियम

सूरज को जल देने के लिए शीशे, प्लास्टिक, चांदी, स्टील, या किसी अन्य धातु के बर्तन का प्रयोग नहीं करना चाहिए। सूर्य को जल देने के लिए हमेशा तांबे के बर्तन का इस्तेमाल करना चाहिए। जल देने के लिए तांबे का लोटा हो तो बेहतर है।

चौथा नियम

सूर्य को जल देने से केवल सूर्य नहीं बल्कि अन्य ग्रह भी मजबूत होते हैं। लेकिन कुछ लोग सूर्य को जल देते समय जल में गुड़ या दूसरी चीजें मिला लेते हैं। ये उचित नहीं है, इससे फल का प्रभाव कम होने लगता है। इसलिए सूर्य के जल में कुछ भी नहीं मिलाएं।

पांचवा नियम

सूर्य को जल देते समय हमेशा अपना मुख पूर्व की दिशा की ओर रखें। अगर किसी पूर्व दिशा की ओर सूरज ना दिखाई दे या बादल हो तब ऐसी स्थिति में उसी दिशा में मुख करके जल अर्घ्य दें।

छठा नियम

सूर्य को जल देते समय लाल पुष्प भी अर्पित करें। आप जल में अक्षत भी मिला सकते हैं। सूर्य ग्रह का रंग लाल होता है, उन्हें लाल पुष्प अर्पित करने से जल देने का फल अधिक हो जाता है।

सातवां नियम

जल अर्घ्य देते समय अगर लाल वस्त्र पहनें जाएं तो बहुत लाभप्रद होता है। जल अर्पित करने के बाद धूप, अगरबत्ती से भी सूरज की पूजा करनी चाहिए।

आठवां नियम

सूय देव को जल अर्पित करते समय निम्नलिखित मन्त्रों का जप करें –

  • ॐ सूर्याय नम:
  • ॐ ह्रीं ह्रीं सूर्याय नमः
  • ऊँ घृणि: सूर्यादित्योम
  • ऊँ घृणि: सूर्य आदित्य श्री
  • ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय: नम:

नौवां नियम

सूर्य देव को चढ़ाए जाने वाले जल की छींटे कभी भी जल चढ़ाने वाले के पैरों पर नहीं पड़नी चाहिए। ऐसा होने पर जल अर्घ्य का फल नहीं मिलता।

दसवां नियम

सूर्य को जल देते समय हाथ सदैव सिर के ऊपर होना चाहिए। ऐसा करने से सूर्य की सात किरणें शरीर पर पड़ती हैं। सूर्य देव को जल अर्पित करने से नवग्रह की भी कृपा रहता है।

शास्त्रों के अनुसार, ये कुछ नियम हैं जिनका पालन करते हुए ही सूर्य को अर्घ्य देना चाहिए। इन नियमों की अनदेखी करने से सूर्य अर्घ्य देने का फल नहीं मिलता। इसीलिए नियमों के अनुसार ही सूर्य को जल दें।